Posted by: BrajMohan Singh | December 1, 2010

आम का पेड़

एक गाँव में एक वैद्य रहता था | उसका एक लड़का था जिसका नाम उद्धव था | वैद्य के घर से लगा हुआ अगला घर एक व्यापारी का था | व्यापारी का भी एक लड़का था जिसका नाम नंदन था | जहा व्यापारी और वैद्य का रिश्ता सामाजिक पडोसी का था वही दोनों के लड़के परम मित्र थे | साथ में विद्यालय जाना, खेलना, शरारत करना, खाना खाना आदि | वैद्य का लड़का उद्धव व्यक्ति प्रधान स्वाभाव का था | किसी को भी मुसीबत में देख वो उसकी मदद के लिए तैयार हो जाता था | वही उसके विपरीत उसका परम मित्र नंदन वस्तु प्रधान था | वो अपने काम में ज्यादा ध्यान देता था और व्यवहारिकता में थोडा लापरवाह था | दोनों का स्वबह्व और व्यव्हार अलग होने पर भी दोनों की मित्रता प्रगाढ़ थी |

इसी प्रकार समय बीतता रहा | दोनों मित्र अब बालपन छोड़ कर अपनी युवावस्था में प्रविष्ट हो चुके थे | दोनों ने अपनी पढाई भी पूरी कर ली थी | व्यापारी का बेटा अपने पिता के काम में हाथ बताने लग गया था और व्यपार करने के तरीके सिख रहा था | दूसरी तरफ वैद्य का लड़का भी अपने पिता के साथ रोगियों की सेवा करने लगा था | समय के साथ वैद्य और व्यापारी दोनों का स्वर्गवास हो गया और घर की जिम्मेदारी उनके लडको पर आ गयी |

इसी बीच व्यापारी का बेटा एक दिन कही से एक आम का पौधा ले आया | उसने उस पौधे को अपने घर के बगीचे में लगा दिया | जिस जगह नंदन ने वो पौधा लगाया था वो जगह उद्धव के बगीचे के पास थी | नंदन पौधा लगाने के बाद अपने काम में व्यस्त हो गया और वो आम का पौधा अपने सामान्य रूप से बढ़ रहा था | कुछ महीने बाद नंदन को व्यापार के कारण कुछ समय के लिए विदेश जाना पड़ गया } उसने अपने मित्र से अपने घर की देखभाल करने को कहा और वयापार के लिए चला गया |

इधर वो आम का पौधा धीरे धीरे सूखने लगा था | कुछ दिनों बाद उद्धव की नजर उस पौधे पर गयी और उसे सूखता देख कर वो उदास हो गया | उसने जमीन की सफाई की, उसमे खाद-पानी डाला , पौधे के चारो तरफ एक घेरा बनाया | कुछ दिनों में उद्धव की मेहनत रंग लायी और वो पौधा बड़ा हो गया | साथ ही उस पेड़ की एक टहनी बढ़कर उद्धव की जमीन में आ गयी | समय के साथ उस टहनी में एक आम का फल लगा | पुरे पेड़ में सिर्फ एक फल लगा देखकर उद्धव खुश भी था, और अस्चार्यचाकित भी | वो अब भी पेड़ की सेवा करता था और इस इंतजार में था की कब वो फल पके और वो उसे खाए |

एक सुबह जब वो उठा तो देखा की उसका मित्र नंदन विदेश से वापस आ गया है और वो आम के पेड़ पर से वो फल तोड़ने की कोशिश कर रहा है | मित्र को देखकर उद्धव पहले तो खुश हुआ पर फिर उसे गुस्सा आया | जिस फल के लिए उसने इतनी मेहनत की, इन्तेजार किया उसे कोई और कैसे खा जाये | उसने अपने मित्र से कहा की वो आम को न तोड़े क्योंकि वो टहनी उसकी जमीन में है और उस फल पर अब उसका अधिकार है | यह सुन कर नंदन को भी गुस्सा आ गया और दोनों के बीच धीरे धीरे बात बढ़ने लगी और झगडे का रूप ले लिया | आस पास के लोगो ने दोनों को समझाने की कोशिश की पर जब दोनों नहीं माने तब पंचायत बुलाई गयी और सारा किस्सा बताया गया | किस्सा सुन कर पंचायत भी सोच में पड़ गयी की उस फल पर किसका अधिकार है – जिसने पौधा लगाया उसका या जिसकी जमीन में वो टहनी है और जिसने उस पौधे की देखभाल की |

जब पंचायत इस का फैसला करने में अक्षम रही तब सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में दोनों गए | सम्राट विक्रमादित्य ने दोनों की बात सुनी और अगले दिन न्याय करने का आश्वाशन दिया | अगले दिन दूर दूर से लोग राजा का फैसला सुनने के लिए दरबार में आये | सम्राट अपना निर्णय दे इससे पहले आपको कुछ करना है… :)

आपको यह कहानी पढकर यह बताना है की राजा विक्रमादित्य की जगह आप होते तो आप क्या करते |

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Responses

  1. Nice one…..main khud hi kha jaata…..seriously main usse udhav ko de deta..

    • Thanks Ashish. But in the end, it goes to Nandan… :)


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